Tuesday, 21 May 2013

Bargad Ka Ped

मैं बरगद की तलाश में निकला था 
लेकिन मुझे बबूल बहुत मिले
कुछ नीम भी थे 
साथ में जामुन के दरख़्त भी थे 
गर्मी का मोसम है
आम की टेहेनिया भी झुकी नज़र आई 
लेकिन कहीं भी बरगद का दरख़्त नज़र नहीं आया 
जंगल शहर में कब तब्दील हुआ
किसी को मालूम न था 
बस रस्ते बता रहे थे मैं शहर 
की राह पे हूँ 
क्युकी गाँव के रस्ते
तो आजतक कच्चे है
अब सारे दरख़्त उजड़ गए
लम्बे लम्बे मकान खड़े है दोनों सिम्त
कोई भी झुला अब नहीं दिखता
अब शहर में बरगद की छाव नहीं मिलती 
गाँव याद बहुत आता है
लेकिन घर की मजबूरियों ने शहर की
ज़ंजीर बनाके पैरो में  बेड़िया डाल दी है 
अलतमश

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