Saturday, 27 October 2012

Gareeb Ki Eid


Gareeb Ki Eid


जो असमान है मुखालिफ, तो ज़मीन दुश्मन
कहीं न उसका ठिकाना, न है कोई मिस्कीं
गरीब मुफलिस व नादार और निशात  ऐ  ईद
ख्याल व ख्व़ाब है, या वहम या गलत उम्मीद
जहां में जिसे राहत है, ऐश व इशरत है
उसी के वास्ते सरमाया मस्सर्रत है
गरज़ ख़ुशी से है क्या हम भक्तों को
है रंझ व ग़म से सदा काम फाखा मस्तो को
जहाँ में करते है मसरूर और बेग़म ईद

हम ऐसे खानाबदोशों की है ‘जलाल’ महरूम ईद 



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