Thursday, 1 November 2012

तनहा रात

ठिठुरती राते वो भी तनहा ,
गुलाबी मोसम और वो भी नादार,
सबा का यू चलना और बदन को छु के निकलना,
आजाओ के मोसम तुम्हारे नगमे गाने लगे है ,
तितलिया भी परो पे रंग तुम्हारे भरने लगी है ,
सूरज भी तकता   रहता है हर सुबह राहे तुम्हारी,
धुप मैं भी अब वो जोश ऐ गर्मी नहीं है ,
सुरमई होगई है ज़िन्दगी मेरी आजाओ बसंत भर दो,

कवी : सय्यद मोहम्मद अलतमश

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