लगी थी जो आग अब वो ठंडी हो गई,
उडी थी जो खाक अब वो गंगा मैं मैली
हो गई ,
मैं जनता था कुछ दिन का शोर गुल है
मनुहार आवाजो का देश मैं गुल है ,
सो गए है लोकतंत्र के मंच को बेच कर
जो न्यायाधीश थे गुल हो गये ज़मीर बेच
कर ,
हुआ है शर्मिंदा भारत, भारत मैं
लोग कह रहे है नहीं लुटती है इज्ज़त
भारत मैं ,
मैं जनता था शर्मसार इस बार भी
तुम्ही होगी
समाज का सबसे बड़ा आँखों का काटा भी
तुम्ही होगी ,
नहीं आते है कृष्ण बचाने द्रौपदी को
हर बार
आते है रावन समझाने ज़माने को हर बार
,
होती है शादी जलती है नारी
मरती है नारी पिसती है नारी ,
दिखाती नहीं पीड़ा फिर भी सजती है
नारी
किस देश की है ये नारी भारत देश की है ये नारी |
लेखक : अलतमश जलाल

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