Friday, 8 February 2013

अकेली रात ..


अकेली रात .....

रात डसती भी है रात सताती भी है
लाखो दिलो को तन्हाई महसूस कराती है रात
ये ख्याल भी तो रात ने ही दिए है
जो लिख रहा हूँ वो अलफ़ाज़ भी तो रात ने ही दिए है
अजब सन्नाटा परेसे हुए आती है रात
आफताब होता है उरूज दबे पाँव चली जाती है रात
मैं फिर बारहा करता हूँ इंतज़ार
न जाने कैसे आँखों ही आँखों मैं कट जाती है ये रात
खेल अजब है इसका नाजिल होती है आँखों से पहले
जब उतरती है जिस्म मैं तो सुरूर बन जाती है रात
सुबह की पहली शहतीर से खुमार बन जाती है रात

अलतमश जलाल

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